धर्म-कर्म

*ऋषिकेश से उज्जैन महाकालेश्वर, ओंम्कारेश्वर, ममलेश्वर यात्रा की कहानी-यात्रा वृतांत!*!

देवभूमि जे के न्यूज़, ऋषिकेश!

#ऋषिकेश से #उज्जैन #महाकालेश्वर, #ओम्कारेश्वर, #ममलेश्वर #यात्रा की #कहानी!
*द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्-
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥
एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति।
कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वरा:*
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
प्रेम के समस्त व्यवहार आज के युग में धन के लिये है। परमार्थ के लिये प्रेम का व्यहार नहीं हैं।
कबीर कहते हैं कि कलयुग में परोपकार के लिये परमार्थी शायद ही मिलते हैं! पर इस जगत में बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो परोपकार के लिए जीते हैं, और जब भी मौक़ा मिलता है,दिल खोलकर उपकार करने में लग जाते हैं।
उनकी सोच —
“ना जाने किस वेष में नारायण मिल जाए”! मेरी इस यात्रा में ऐसे ही कुछ स्वजनों से मुलाकात हुई, जिन्होंने खुलकर,बिना किसी सर्वार्थ के हमसे मिलकर हमारा स्वागत किया!
*बचपन से ही मेरे मन में प्रकृति ने मुझे जिज्ञासु बना रखा है! मेरे मन में बचपन से ही प्रकृति के प्रति अगाध श्रद्धा है । मैं मन ,वचन,कर्म, से हमेशा ही प्रयासरत रहता हूं कि मेरे द्वारा किसी भी जीव का अहित न हो ।
मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।
को आत्मसात कर जो भी मेरे पास आते हैं, अथवा मिलते हैं, उनका अपने सामर्थ्य के अनुसार मदद करने का प्रयास करता हूं!पर अब तक मुझे बदले में बुराई ही मिली है!
लाख कोशिशों के बावजूद मैं अपने इस आदतों को छोड़ नहीं पाया!
पर एक अच्छी बात यह है, कि इसका लाभ मुझे पग -पग पर मिलता है! और मैं जहां भी जाता हूं, मुझे चारों तरफ से मदद मिलती है ।30 अगस्त 2019 को सुबह सावन के महीने में मैं उज्जैन महाकालेश्वर की यात्रा के लिए पत्नी रंजू तिवारी, समधी काशीराम बिजल्वाण जी, उनकी पत्नी शशि बिज्लवाण जी के साथ देहरादून उज्जैनी एक्सप्रेस से बिना किसी तैयारी के बाबा के दर्शन की अभिलाषा लिए हुए निकल पड़े।

उज्जैन में जान पहचान के नाम पर फेसबुक के एकमात्र मित्र हमारे जय नारायण शर्मा थे ।
उन्होंने मुझे बताया था की उज्जैन से लगभग 20 किलोमीटर दूर शंकरपुरा गांव में मैं रहता हूं, ट्रेन अपने नियत गति से चलती रही ट्रेन में घर से खाने पीने का सामान पूरा लेकर हम लोग चले थे। उज्जैन पहुंचने पर जय नारायण शर्मा ने अपने दो साथियों गोपाल शर्मा, विकास शर्मा को भेजा था, जो हमें लेने के लिए स्टेशन पर आए हुए थे ।उन लोगों ने हम चारों को थ्री व्हीलर से लेकर होटल चाणक्य में आ गए।
दो कमरे जो कि जयनारायण शर्मा,और उनके मित्र अनिल बघेला महाकालेश्वर मंदिर के बिल्कुल पास ले लिया था।वहां पर महेश पुजारी जी जिनका परिचय करवाया था इंदौर के हमारे परम पूज्य स्वामी शिवार्थ (डॉक्टर जे.के.भट्ट) शिवोमा आश्रम के संस्थापक!
उन्होंने पुजारी जी का नंबर दिया था, महेश पुजारी जी ने उस समय हमारे लिए बहुत ही अच्छी व्यवस्था अच्छे कमरे साफ सुथरे दिला दिए, और उन्होंने बोला कि अभी मैं आप चारों के लिए भस्म आरती के लिए पास बनवा देता हूं ।और रात के 2:00 बजे आप लोग वहां भस्म आरती का दर्शन करेंगे। उसके बाद हम 5:30 बजे अभिषेक की करेंगे। बाबा की कृपा से सारी तैयारियां पूरी हो गई। भस्मारती का पास भी बन गये वहां पर भस्म आरती के पास बनाने के लिए आधार कार्ड जरूरी है ,बाकी कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। परन्तु कतार बहुत लंबी होती है,वो भी सावन के महीने में!

ऑनलाइन भी बुक करवा सकते हैं ,परंतु हमें इसका ज्ञान नहीं था ।सो हम वहां गए तो पंडित जी ने हमारी भस्म आरती का पास बनवा दिया। हम लोग बड़े ही खुश थे कि कल भस्म आरती का दर्शन और बाबा का अभिषेक कर हम अन्य दर्शनीय स्थलों की दर्शन के लिए प्रस्थान करेंगे ।
तभी ग्यारह बजे स्वामी शिवार्थ जी का फोन आया कि तिवारी जी कहां हो? हमने कहा कि हम लोग होटल में बैठे हुए हैं, और अभी नाश्ता वगैरह कर रहे हैं !उन्होंने कहा कि आप ऐसा करो कि होटल वाले से बातचीत कर एक गाड़ी लेकर अभी की अभी निकल लो। वहां से 160 किलोमीटर की दूरी पर ओम्कारेश्वर ,ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग है‌। वहां दर्शन करेंगे ,और बीच में टेढ़ी घाट मिलेगा, वहां पर हम नर्मदा नदी में अपने पूर्वजों के लिए आज अमावस्या है! तर्पण करेंगे।
सारी तैयारियां हमने कर रखी है आप वहां से गाड़ी लेकर चलो स्वामी जी का आदेश सिर माथे पर! हम लोग आनन-फानन में पूरी तैयारी की होटल के मैनेजर से कहा कि कोई अच्छी सी गाड़ी बुक कर दो ।आर्टिका गाड़ी हमारे लिए बुक कर दिया, और हम लोग गाड़ी लेकर और कुछ कपड़े कुछ सामान लेकर ममलेश्वर और ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए निकल पड़े। चुकी गाड़ी आने में और जाम की वजह से लेट हो गया ।इसलिए हम लोग 12:30 बजे के करीब होटल से निकले रास्ते में हम लोगों ने खाना खाया। फिर इंदौर में स्वामी जी से बाईपास रोड पर मुलाकात हो गई ।स्वामी जी हमारे साथ आ गए, और हमारी यात्रा उनकी टीम के साथ जो कि लगभग 6 लोग थे। पार्षद और डॉक्टर दीप्ति त्रिपाठी सहित स्वामी जी के अन्ननयभक्तअपनी गाड़ी लेकर आए ।
स्वामी जी से गाड़ी में बैठे बैठे रास्ते में वार्तालाप होने लगी ।पहली बार स्वामी जी से मिलकर मन प्रसन्न हो गया। दोनों पहली बार मिले उससे पहले हमारी मुलाकात फेसबुक और व्हाट्सएप और मोबाइल से बातचीत होती थी। पर स्वामी जी से पहली बार में मुलाकात के दौरान लगने लगा कि कोई अपने सगे वाला मिल गया हो। स्वामी जी अपने आप में एक जबरदस्त महाशक्ति के रूप में हमें मिले ,उनके साथ आए हुए उनके शिष्यों ने हमें कहीं भी किसी प्रकार से कोई परायेपन का अहसास नहीं होने दिया।

हांलांकि आजकल जिस प्रकार से व्यक्ति की परिभाषा बदल गई है, मानवता, इंसानियत केवल शब्दकोश की शोभा बढ़ा रहे हैं, वही इस संसार में अच्छे लोगों की कमी नहीं है। जहां कहीं भी हम होटल अथवा मंदिर में पूजा पाठ करते स्वामी जी हमारे से एक पैसा खर्चा करने के लिए मना कर देते। कहते कि तुम हमारे यहां आए हो हमारे मेहमान हो, तुम्हारा कोई भी औचित्य नहीं बनता तुम एक पैसा अपना खर्च करो ।स्वामी जी का अपनत्व पाकर मन धन्य हो गया ।सचमुच इस संसार में कोई कोई संत विरले होते हैं, जो इस जगत में आकर जीवों के उत्थान लिए कुछ करने की ठान लेते हैं ।स्वामी जी ने इंदौर स्थित द्वारिकापुरी अपने आश्रम में अनेकों प्रकार के आविष्कार किए हैं!

अनेकों प्रकार की दवाओं का आविष्कार कर निर्माण कर इस संसार को सौंपा है। स्वामी जी के आश्रम में दीन दुखियों की सेवा के लिए चाहे वह आईएएस, पीसीएस, डॉक्टर, इंजिनियर की तैयारी के लिए हो, कोई ऐसा निर्धन व्यक्ति जो कि अपने शरीर की देखभाल दवा दारू ना करा पा रहा हो ।उसके लिए आश्रम में आज की अत्याधुनिक मशीनें लगी हुई है। और स्वामी जी अपनी पूरी टीम के साथ सेवा,मदद कर अपने आप को अभिभूत मानते हैं। स्वामी जी का जीवन अनेकों बड़े पदों पर सरकारी नौकरियों पर करते हुए बीता, परंतु स्वामी जी ने “*सर्वजन हिताय- सर्वजन सुखाय*” की नीति को अपनाते हुए अनेकों प्रकार के सेटेलाइट अनेकों अनेकों प्रकार की दवाओं का आविष्कार करने के पश्चात भी जनमानस से जुड़ते हुए और ज्योतिष के प्रकांड विद्वान होते हुए भी, अहंकार उनको छू नहीं पाया है ।और स्वामी जी ने बिल्कुल अपने एक छोटे भाई की तरह मुझे मंदिरों के दर्शन कराए । प्रत्येक मंदिरों में पूजा-अर्चना हेतु उन्होंने दो विप्रों को अपने साथ रखे थे!जो हर जगह विधि विधान से पूजा करवा रहे थे! स्वामी जी का अपनत्व उनका सानिध्य मुझे मिला उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है, कि मैं उसको किस प्रकार वर्णन करूं। स्वामी जी के पास बहुत देर तक तो नहीं रह पाए ,लेकिन मन में जिज्ञासा है कि दुबारा उनसे मिलकर और नजदीक से उनको और देख सुनकर उनके विषय में जाना जाए, सुना जाए।

स्वामी शिवार्थ जी स्वयं सुस्वास्थ्य। जन अभियान के अंतर्गत हस्त योग मुद्रा पर “हस्त मुद्रा विज्ञान”नामक एक पुस्तक लिखी है जिसमें बिना किसी खर्चे के जटिल रोगों का इलाज हो सकता है!
स्वामीजी ने बताया कि अभी हम टेरी घाट चलेंगे और वहां पर पितरों के लिए आज अमावस्या के दिन तर्पण करेंगे। उसके बाद हम दर्शन के लिए ओम्कारेश्वर ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग जायेंगे! गाड़ी अपनी गति से चलती रही मध्यप्रदेश में जहां भी हम गए चारों तरफ हरियाली ही हरियाली का साम्राज्य था! चारों तरफ हरियाली और जैसे कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड बिहार में जगह-जगह मीट- मांस -अंडे की दुकानें हमें देखने सुनने को मिलती है ,वैसी दुकानें वैसी मार्केट में देखने सुनने को ना के बराबर थी! इस बीच ड्राइवर से जो कि हमने किराए पर टैक्सी ली थी कुछ कहासुनी हो गई! स्वामी जी ने उसको डांटा फटकारा उसने बोला कि नहीं हम तो केवल ओम्कारेश्वर ,ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करवा कर आएंगे‌। हम टेरी घाट पर तर्पण के लिए नहीं जाएंगे। स्वामी जी ने उसको बहुत समझाया लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ा रहा । गाड़ी मालिक के पास फोन करने पर स्वामी जी का परिचय जानकर गाड़ी मालिक ने ड्राइवर को निर्देश दिया कि स्वामी जी के आदेश का पालन करो।पर स्वामी जी ने टेरीघाट के कार्यक्रम को दरकिनार कर ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग पहुंचकर विप्रों द्वारा वहां पूजा अर्चना सारा सामान लेकर, तैयारी से हम लोग मंदिर के गर्भ गृह में जाकर पूजा अर्चना किया। वहां से फिर नर्मदा नदी के पावन तट पर गए और वहां जाकर विधिवत स्वामी जी के द्वारा पितरों के लिए तर्पण किया गया‌। उसके बाद 101 दीपदान मां नर्मदा में प्रवाहित कर स्नान कर हम लोग पुल पार कर सभी व्यक्ति ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग पहुंचे। वहां विप्र बंधुओं ने विधिवत पूजा-अर्चना करवा कर फिर वापस आए ,उस समय लगभग सांय के 8:00 बज गए। और पहाड़ियों से होते हुए हम लोग धीरे धीरे धीरे धीरे रात्री के लगभग 1:00 बजे होटल पहुंचे। होटल में पहुंचने के बाद हम लोग थक कर चूर हो चुके थे ।अब उसी समय 2:00 बजे रात्रि भस्म आरती और पूजा अर्चना में जाने के लिए शरीर तैयार ना था ।हम लोग सो गए और ठीक सुबह 5:30 बजे महेश पुजारी जी का फोन आया कि तिवारी जी कहां हो? हम अभिषेक के लिए आपका इंतजार कर रहे हैं। हमने कहा कि महाराज हम तो थक गए थे रात्रि के 1:00 बजे पहुंचे और हिम्मत जवाब दे गई हम नहीं आ पाए, पुजारी जी ने कहा कि जब आप लोग नहीं आ रहे हो हम तो सुबह-सुबह ग्वालियर के लिए निकल जाएंगे। हमारे किसी रिश्तेदार की मृत्यु हो गई है उसमें हमें जाना पड़ेगा। आप व्यवस्था करवा लीजिएगा, सुनकर मन बेचैन हो गया कि अब महाकाल बाबा का बढ़िया से दर्शन नहीं हो पाएगा। तभी एक मेरे मित्र ने राधेश्याम पुजारी जी जो कि वहां के पुजारी है, उनका नंबर दिया राधेश्याम पुजारी जी से संपर्क किया तो उनका नंबर नहीं लगा। फिर उनके बेटे का नंबर लगाया तो उन्होंने अपने पिताजी का एक दूसरा नंबर दिया और उनसे बातचीत हुई तो उन्होंने कहा कि अभी आप सीधे उज्जैन के सारे मंदिरों का दर्शन कर लो और 4:00 बजे वहां भस्म आरती की खिड़की पर जाना और किसी कर्मचारी से बात करवाना ।हम आपकी भस्म आरती की व्यवस्था करवा देंगे। दिन भर हम लोगों ने गाड़ी से हर मंदिरों के दर्शन किये।

उज्जैन के प्रमुख दर्शनीय स्थल निम्नानुसार हैं —–
#१.बड़े गणेश २.शनि नवग्रह मंदिर ३. इस्कोन्न टेम्पल ४. चिंतामणि गणेश ५. भरथरी गुफा ६. गढ़कालिका देवी ७. पीर मतेस्यन्द्र्नाथ ८. कालभैरव मंदिर ९. कलिदेह प्लेस १०. सिध्ध्वत ११.मंगलनाथ मंदिर १२. संदीपनी आश्रम , गोमती कुण्ड ,सर्वेश्वर महादेव १३ हर्सिध्धि माता १५. २४ खम्बा मंदिर १६ शनि संकट हरण मंदिर १७. गोपाल मंदिर १८ पटल बहिरव १९ राम घाट और मंदिर २० श्री चार धाम मंदिर २१. अंगारेश्वर महादेव इत्यादि!
यह धरती है #महाकाल की उज्जैन अपने मंदिरो के लिए सुप्रसिद्ध है। यह शहर मध्य प्रदेश राज्य में स्थित है। भोपाल से १७३ कि. मी. दूर है तथा देश के सभी मुख्य शहरों से रेल और बस द्वारा जुड़ा हुआ है। उज्जैन को उज्जैनी, अवन्ति, अवंतिका तथा अवंतिकापुरी भी कहा जाता है।
चारों तरफ महाकाल की जय जयकार सुनाई देती है। उज्जैन में कई प्रसिद्ध मंदिर है जिनकी बड़ी मान्यता है।कहते है यदि बैलगाड़ी भर के अनाज लाया जाये और एक-एक मुठी हर मंदिर में चढ़ाई जाये तो अनाज खत्म हो जायेगा, पर उज्जैन में मंदिरों की गिनती खत्म नहीं होगी। उज्जैन घूमने के लिए कम से कम 2-3 दिन का समय चाहिए।

पुराणों में उल्लेख है कि भारत की पवित्रतम सप्तपुरियों में अवन्तिका अर्थात उज्जैन भी एक है। इसी आधार पर उज्जैन का धार्मिक महत्व अतिविशिष्ट है। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर का यहां स्‍थित होना। उपरोक्त दोनों तथ्‍य उज्जैन की प्रतिष्ठा एवं महत्व को और भी अधिक बढ़ाने में सहायक होते हैं। यहां पर श्मशान, ऊषर, क्षेत्र, पीठ एवं वन- ये 5 विशेष संयोग एक ही स्थल पर उपलब्ध हैं। यह संयोग उज्जैन की महिमा को और भी अधिक गरिमामय बनाता है। उक्त दृष्टिकोण से मोक्षदायिनी शिप्रा के तट पर‍ स्‍थित उज्जैन प्राचीनकाल से ही धर्म, दर्शन, संस्कृति, विद्या एवं आस्था का केंद्र रहा है। इसी आधार पर यहां कई धार्मिक स्थलों का निर्माण स्वाभाविक रूप से हुआ। हिन्दू धर्म और संस्कृति के पोषक अनेक राजाओं, धर्मगुरुओं एवं महंतों ने जनसहयोग से इस महातीर्थ को सुंदर एवं आकर्षक मंदिरों, आराधना स्थलों आदि से श्रृंगारित किया। उज्जैन के प्राचीन मंदिर एवं पूजा स्थल जहां एक ओर पुरातत्व शास्त्र की बहुमूल्य धरोहर हैं, वहीं दूसरी ओर ये हमारी आस्‍था एवं विश्वास के आदर्श केंद भी हैं।
दर्शन करने के बाद हम लोग सीधा मंदिर के प्रांगण में आए ।और वहां राधेश्याम पुजारी जी का नंबर मिला कर हमने अधिकारी से बात करवाया तो अधिकारी ने हमसे आधार कार्ड मांगा। चारों का आधार कार्ड का नंबर सहित एक फार्म भर कर उन्होंने कहा कि जाइए आपका भस्म आरती के पास बन गया है ।आपके मोबाइल पर मैसेज आ जाएगा। लगभग 1 घंटे बाद हमारे पास मैसेज आ गया हम लोग फूले नहीं समा रहे थे कि बाबा महाकाल की कृपा हमारे ऊपर हुई ।और हम लोगों को भस्म आरती के दर्शन करने का सौभाग्य मिला ।हम लोग पूरी तैयारी के साथ सुबह की तैयारी करने लगे ।और इस बीच हम लोग लगभग 5:00 बजे होटल से निकलकर शिप्रा नदी के तट पर रामघाट पहुंचे वहां का मनोरम दृश्य देखकर मन अभिभूत हो गया। हम लोग शिप्रा नदी में नौकायन की ,नौका से पूरे घाटों के सांयकालीन नजारों का अवलोकन किया। तत्पश्चात एक होटल में भोजन कर विश्राम के लिए चले गए ।और मोबाइल में अलार्म भर कर सो गए ।
रात्रि 1:00 बजे उठकर स्नान वगैरह कर हम पूजा का सामान लेकर मंदिर की तरफ वीआईपी गेट का रुख किया। वहां जाकर हमें पता चला कि 11:00 बजे से ही लोग लाइन में लगे हुए हैं और 2:00 बजे तो लास्ट में लोग आते हैं। जो कि हम लोग बाद में आए तो हमें सबसे पीछे जगह मिला हमारे पीछे करीब 100 लोग थे, हमें भस्म आरती के लिए उपयुक्त स्थान नहीं मिला।कारण देरी!जब भी भस्म आरती के लिए आप जायें तो १२बजे लाइन में अवश्य ही लग जाये वरना उपयुक्त जगह नहीं मिल पायेगा! लेकिन बड़ी स्क्रीन की टेलीविजन के माध्यम से हम लोगों ने दर्शन किया। उसके बाद जैसा कि राधेश्याम पुजारी जी ने बताया था कि आप मंदिर के प्रांगण में रहना ,हम आपको अपने आप बुलाएंगे और जब हमने 5.30पर पुजारी जी मोबाइल मिलाया तो स्विच ऑफ बताया। हमें जानकारी नहीं थी कि सावन में समस्त पुजारियों व्यवस्थापकों को भस्म आरती के समय मोबाइल बंद रखना होगा।
बड़ी निराशा हुई कैसे दर्शन होगा ठीक 5:30 बजे पुजारी जी का मोबाइल फोन खुला हमने उनको फोन कर बताया कि हम यहां पर आपका इंतजार कर रहे हैं ।पुजारी जी का एक आदमी आया और हम लोगों को लेकर गया। वहां सरकारी रसीद यदि आप अभिषेक करना चाहते हैं तो प्रत्येक व्यक्ति का 17 सौ रुपये का रसीद कटवाना पड़ता है ।हम लोगों ने रसीद कटवा कर पुजारी जी के साथ गर्भ गृह में गए ।और बाबा महाकाल का विधिवत पूजा-अर्चना-अभिषेक किया ।
जो मन में हमने सपने संजोए थे ,कि बाबा का इस प्रकार से दर्शन करेंगे बाबा ने हमारी मनोकामना पूर्ण की । बाबा का भाव पूर्ण दर्शन कर मन प्रसन्न हो गया।मन में एक अद्वितीय शांति का संचार हुआ!
हमने पुजारी जी को कोटी कोटी धन्यवाद दिया, पुजारी जी ने हमें बाबा का प्रसाद धोती,भस्म, प्रसाद दिया हम लोग पुजारी जी का धन्यवाद और प्रणाम करते हुए अपने कमरे में आए‌ वहां आकर चाय पीकर कुछ देर आराम किए तभी हमारे शंकरपुरा के मित्र जय नारायण शर्मा अपने साथी के साथ आए और गाड़ी से अपने फार्म हाउस अपने घर ले गए। जहां अन्नदाता जय के पिता पं.श्री राधाकृष्ण शर्माजी से मिलाप हुआ। जय के पिताजी जो कि 8 भाई हैं! चार भाई दूसरे गांव में और चार भाई वही बसे थे, ‌उनका सभी लोगों का परिवार पलक पावडे बिछाए हुए हम लोगों का स्वागत किया।‌ और उन लोगों से मिलकर हमें लगा कि यह तो बिल्कुल अपने सगे से भी बढ़कर है,दिल खोलकर शर्मा परिवार ने हमारा स्वागत किया। जो भी अच्छा से अच्छा हो सकता था उन लोगों ने हमारे लिए किया‌। और सभी से परिचय हुआ तो एक रिश्ता सा बन गया।मानों जन्म-जन्मांतर से हम सब एक-दूसरे को जानते हैं!स्नान ध्यान के बाद भोजन प्रसाद ग्रहण कर महिलाएं महिलाओं के साथ मशगूल हो गयी। हम सबने खूब बातचीत की शुद्ध गाय के दुध से बनी चाय और दूध पीने काआनंद आ गया! भविष्य में हम सभी लोगों ने प्रण किया कि जब भी किसी के साथ कोई सुख होगा, दुख होगा, तो हम उसे मिलकर सम्मिलित रूप से निर्वहन करेंगे । जय नारायण शर्मा दो भाई हैं ,उनके पिता किसान हैं ‌। जय नारायण शर्मा दोनों भाई खुश मिजाज मिलनसार, संस्कारी और सामाजिक व्यक्ति हैं ।उन्होंने जरा सा भी परायापन का एहसास नहीं होने दिया और हम सभी का पुरजोर खातिरदारी किया।
खासतौर पर जय नारायण की माताश्री उन्होंने हमारी बड़ी खातिरदारी की दाल बाटी चूरमा बनाया जो कि उस क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय व्यंजन है ।और मेहमानों के लिए खास प्रकार से बनाया जाता है। हम लोगों ने उनके घर में बैठकर सामूहिक रूप से भोजन किया, और भोजन कर सभी लोगों से परिचय किया उनके परिवार में चाचा ताऊ भाई भतीजे सबसे उनका अपनत्व पाकर मन प्रसन्न हो गया!
सावन के महीने में उस समय वहां पर चारों तरफ सोयाबीन की खेती होती है, वहां का मुख्य व्यवसाय खेती है। सोयाबीन, लहसुन, प्याज, आलू ,मूंगफली ,इन्हीं सब की खेती प्रचुर मात्रा में होती है। धान ना के बराबर है ,गेहूं की खेती होती है। वहां पर नीलगाय फसलों को बहुत नुकसान पहुंचाती है इसलिए वहां के किसान नीलगाय और जंगली जानवरों से बहुत परेशान है। उन लोगों ने अपने सारे खेतों के इर्द-गिर्द चारों तरफ बड़े-बड़े गड्ढे खुद रखे थे! ताकि नीलगाय और जंगली जानवरों से फसलों की रक्षा की जा सके ।ऋषिकेश वापसी की तैयारी में लग गए‌। वहां सुबह का नाश्ता और दोपहर के भोजन के बाद दिलीप धूनीवाले शर्मा जी अपनी गाड़ी लेकर आए और उस पर बैठकर हम लोग कृष्ण सुदामा जिसे नारायणा धाम कहा जाता है! संदीपनी मुनि के आश्रम से राह भटक कर वो यही जगह है जहां पर रात्रि में पहुंच गए थे। वहां उन्होंने जंगल में लकड़ी चुनकर ज्यादा रात्रि होने के कारण वही विश्राम किए ,बारिश हो रही थी, वही विश्राम कर अपनी अपनी गठरी रख दिए । उनकी गठरी आज भी कृष्ण और सुदामा जी के नाम से वहां रखी हुई है। जिसमें हरियाली निकली हुई हैं। और गठरी पूरा हरा भरा हो गया है ।
वहां कृष्ण सुदामा की एक मंदिर है, और एक तालाब भी है कालांतर में तालाब में पानी नहीं है ।परंतु वहां दूर-दूर से लोग आते हैं और जन्माष्टमी के दिन यहां पर कृष्ण महोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। वहां से हम नारायण कृष्ण सुदामा मंदिर का दर्शन कर सिंधिया परिवार द्वारा सूर्य मंदिर के दर्शन के लिए निकले ।सूर्य मंदिर के पास ही शिप्रा नदी में 52 घाट है, जहां पर लोग ऊपरी हवा भूत प्रेत के निराकरण के लिए आते हैं। और वहां स्नान कर अपने आप को प्रेत मुक्त पाते हैं ।वहां से हम लोग महाकाल वन घूमते हुए उज्जैन स्टेशन आए ,और फिर उसी ट्रेन में बैठकर ऋषिकेश के लिए वापस आए ।
#यात्रा का अनुभव बहुत ही सुखद रहा!
परमात्मा पग पग पर आपकी मदद करते हैं! मन में जो भी सच्ची लगन ,ईश्वर के प्रति आस्था और विश्वास हो तो कहीं भी आपको किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं मिलती है। जय बाबा महाकाल, जय ओमकारेश्वर ,जय मामलेशवर!
हर हर महादेव!
लेखक-जय कुमार तिवारी ऋषिकेश!

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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