ऋषिकेशधर्म-कर्मशहर में खास

*स्वामी प्रेम बरणी जी का 88वां जन्मदिवस धूमधाम से मनाया गया।*

देवभूमि जे के न्यूज़, ऋषिकेश!
आज स्वर्गाश्रम स्थित प्रेमबरणी आश्रम में स्वामी प्रेम बरणी जी का 88वां जन्मदिवस धूमधाम से मनाया गया।

सुबह ही आश्रम को तोरण द्वार से सजाकर विधिवत मंत्रोचार वैदिक रीति से पूजा पाठ एवं हवन किया गया।
कोरोना काल के चलते सामाजिक दूरी का पालन करते हुए लोगों ने सपरिवार हवन पूजन में भाग लिया और स्वामी जी के दीर्घायु होने की कामना की।
इस अवसर पर स्वामी जी अपने अनुभव को और आज के परिपेक्ष में जीवन शैली के ऊपर बोलते हुए कहा कि आज के समय में लोग वैदिक जीवन पद्धति को अपना रहे हैं, इसमें कोई संभावना नहीं है। ऐसी होने के मूल में हमारे वेदों में बताए जीवन पद्धति के दिन-ब-दिन बढ़ती लोकप्रियता होने से ऐसा है इस बात में भी कोई संभावना नहीं है। ऐसा होने पर भी हममें से काफी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो अन्य के सामने अपने आप को आधुनिक बताने के फेर में वैदिक जीवन पद्धति से मुख मोड़ कर भौतिक सुखों में ही अपनी खुशियों तलाशने में लगे हैं।

हमें यह बात अच्छी तरह से पता है कि वेदों और अन्य हिन्दू धर्मशास्त्रों में बताया गया है जीवन जीने का ढंग हमारे लिए सदैव आदर्श वाक्य रहा है। वर्षों से यह कई लोगों के लिए जीवन जीने का ढंग भी रहा है। वैदिक धर्मशास्त्रों में हमें सात्विक जीवन जीने के बारे में बताया गया है। यहां हमें उन सोलह संस्कारों के बारे में बताया गया है जिनके पालनोपारांत हम अपने लिए स्वस्थ और सुखी जीवन की कल्पना कर रहे हैं। यहाँ पर मनुष्य के स्वस्थ और स्वस्थ आयु जीवन जीने के लिए हमारा मार्गदर्शन किया गया है। वैदिक सभ्यता में मनुष्य जीवन के हर कर्म को धर्म की डोर से बांध कर हमें नियंत्रित कर सन्मार्ग पर चलने को प्रेरित किया गया है।
दुर्भाग्यवश आगे चलकर वैदिक जीवन की आसान अनुभूतियों में कुछ स्वार्थी लोगों ने लोगों और कुटिलता का समावेश कर इसे विषाक्त बनाने का काम किया। इस प्रकार से वैदिक संस्कृति में कुरीतियों और कुप्रथाओं से कहीं अधिक अंध विश्वास ने अपना पैर ज़माना शुरू कर दिया। आधुनिक काल में भी वैदिक संस्कृति और विश्वास और पोंगापंथी के दायरे से बाहर निकल पाने में असफल होना है। ऐसा होने से हमारी अपनी वैदिक संस्कृति हमारे लोगों के बीच ही आलोचनात्मक और उपहास की वस्तु बनी हुई है। इस बारे में हम जानते हैं कि की आधुनिक पढ़े-लिखे लोग किसी भी चीज़ को तार्किक नज़रिये से पढ़ते हैं। हम और आप ऐसी चीज़ों से दूर ही रहेंगे, जिनका कोई ठोस आधार नहीं होगा।
आधुनिक समय में वैदिक संस्कृति की स्वीकार्यता और प्रासंगिकता इसके उन मूल्यों को बचा कर रखने की हमारी क्षमता पर निर्भर करती है जिसका कोई ठोस वैज्ञानिक, सामाजिक या नैतिक आधार नहीं है। ऐसा नहीं होने पर वैदिक जीवन पद्धति का हमारे बीच से लुप्त हो जाना अवश्यम्भावी प्रतीत होता है। मैंने 10 साल की उम्र में सन्यास लिया और 1958 में इस आश्रम की स्थापना की उस समय स्वामी सुखदेवानंद जी, शिवानंद जी महाराज से मैं रोज मिला करता था और मेरा एक ही मकसद था परमात्मा से साक्षात्कार करना! इसके लिए हमने अनेकों तपस्या एवं योग साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार आत्मा को तृप्त किया। स्वामी जी ने आगे कहा कि सच्चा व्यक्ति जीवन में मिलना सौभाग्य की बात है, हम हिमालय में रहते हैं और हमारे अंदर सात्विक प्रवृत्ति भरी हुई है हमें सदा ही वे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हिमालय की गोद में बैठ कर हमें कभी भी झूठ, फरेब, छल, कपट का अनुसरण नहीं करना चाहिए!
कार्यक्रम में मुख्य रूप से विनीत जी, साध्वी दिव्या, रामलाल, प्रदीप कुमार, सीमा शर्मा, आदर्श चंद्र शर्मा, रंजू तिवारी, कुमारी भूमि, कुमारी अनघा सहित तमाम लोग उपस्थित थे।

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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