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*“चतुरमास्या साधना” में आधुनिक युग हिमालय के वैज्ञानिक योगी एवं संत अवधुत परमहंस स्वामी समर्पणानंद महाराज*

देवभूमि जे के न्यूज़!
चातुर्मास का हिन्दू धर्म में विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता हैं। इस अवधि में नियमों का पालन करते हुए व्रत करने वाले को अपनी मनोकामना पूर्ति में विशेष लाभ प्राप्त होता हैं। हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार, आषाढ मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी की रात्रि से भगवान विष्णु अगले चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं, एवं कार्तिक मास में शुक्लपक्ष की एकादशी के दिन योगनिद्रा से जागते हैं। इसलिये इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता हैं। चातुर्मास का हिन्दू धर्म में विशेष आध्यात्मिक महत्व इसलिए भी माना जाता हैं कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन चार महीनों में शुभ मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, देवी-देवताओं की प्राण-प्रतिष्ठा, यज्ञादि संस्कार बंद रहते हैं। चातुर्मास का सम्बन्ध देवशयन अवधि से है। शास्त्रों के अनुसार वर्षा ऋतु के चारों मास में लक्ष्मी जी भगवान विष्णु की सेवा करती हैं। इस अवधि में यदि कुछ नियमों का पालन करते हुए व्रत करने वाले को अपनी मनोकामना पूर्ति में विशेष लाभ प्राप्त होता हैं।
इन दिनों लक्ष्मणझूला स्थित अपने आश्रम में अवधुत परमहंस संत स्वामी समर्णानंद जी ने पंचागनी साधना के बाद जुलाई ६ से चतुरमास्या साधना का संकल्प लिया हैं। यह साधना २ माह अतः ५ सितम्बर तक होगी इस साधना में सूर्य अस्त होने के बाद कोई भी अन्नसेवन नहीं करते हैं, और सूर्य अस्त से लेकर सूर्य उदय तक मौन रहते है। और श्री स्वामी जी अपने सीमांत के अंतर्गत रहते हैं।
स्वामी जी ने बताया कि साधना में रत साधक को किसी भी नदी को पार नहीं करना होता हैं। यह साधना केवल सन्यासी साधुओं के लिए ही हैं। यह साधना विश्व शांति ओर मानव कल्याण के लिए ही है तथा साधना से कोविड-१९ महामारी कोहराने(समाप्त) करने में सहायता मिलेगी। ईश्वर की आराधना करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें,ब्राह्मणों को स्वर्ण अथवा पीले रंग की वस्तुओं का दान करें, भगवान विष्णु की महिमा का गुणगान करें, कमल पुष्प से उनका पूजन करें मंदिर में दीपदान करें।

चातुर्मास की महिमा बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि व्रत करने वाले को शय्या-शयन, मांस, मधु आदि का त्याग करना चाहिए। उसे जमीन पर शयन करना चाहिए, पूर्णत: शाकाहारी रहना चाहिए तथा मधु आदि रसदार वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दौरान फर्श पर सोना और सूर्योदय से पहले उठना बहुत शुभ माना जाता है। उठने के बाद अच्छे से स्नान करना और अधिकतर समय मौन रहना चाहिए।
यह साधना योग का बहुत बड़ा अंग हैं जो की आज के युग में लगभग लुप्त हैं। श्री स्वामी जी ने वैज्ञानिक पद्धति से सम्पूर्ण विश्व में जैसे अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको, पूरे यूरोप, दक्षिण पूर्व एशिया ओर ईरान सहित ४६ देशों में वैदिक सनातन धर्म, योग, तंत्र शाष्त्र, वेदांत एवं भारतीय संस्कृति की तिरंगा फहराया हैं।
श्री स्वामी जी ने विश्व हिंदू धर्म सम्मेलन शिकागो (अमेरिका)ओर विश्व धर्म संसद टोरंटो (कनाडा) में भाग लेकर भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म को वैज्ञानिक पद्धति से आधुनिक युग को नई ऊर्जा प्रदान की हैं। श्री स्वामी जी ने विश्व शांति एवं मानव कल्याण के लिए पूरे विश्व को “लोकाः समस्ता: सूख़िनो भवंतु” का संदेश देते आ रहे हैं।
श्री स्वामी जी दीर्घ २५ वर्षों से स्वामी शिवानंद जी एवं आदी गुरु शंकराचार्य के विचारो को तथा वैदिक सनातन धर्म ओर योग को पूरे विश्व में वैज्ञानिक ओर आध्यात्मिक तरीक़े से प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।
वेद वेदांग, भारतीय संस्कृति और भारतीय जीवन दर्शन को अपने जीवन में आत्मसात करने वाले स्वामी जी अपनी साधना को जन-जन तक पहुंचाने में लगे हुए हैं।

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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