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*गंगा दशहरा:2020-अविरल और निर्मल गंगा, माँ गंगा अब एवं कोविड-19 के पश्चात -स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

देवभूमि जे के न्यूज़, ऋषिकेश!
ऋषिकेश, 1 जून। आज गंगा दशहरा के पावन अवसर पर माँ गंगा को अविरल और निर्मल बनाये रखना हेतु वेबनार का आयोजन किया गया जिसमें परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज, डॉ रमेश पोखरियाल निशंक , माननीय केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री सहित कई विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों एवं प्रोफेसरों ने सहभाग किया।
वर्तमान में आयी वैश्विक कोविड-19 महामारी के कारण हुये लॉकडाउन के दौरान, नदियों में और उसके आस-पास वन्यजीवों की दृश्यता में वृद्धि के साथ ही नदियों का स्वच्छ स्वरूप और स्वच्छता के साक्ष्य प्राप्त हुये है। जैसा कि हम पोस्ट-लॉकडाउन, उद्योग को फिर से शुरू करते हैं, तो यह जरूरी है कि हम इस झलक को याद रखें कि लाॅकडाउन के दौरान नदियांे ने अपना प्राचीन स्वरूप, पवित्रता, सुंदरता का दर्शन कराया और प्रदूषण के प्रभाव को तेजी से कम किया है इस पर विशेष ध्यान दिये जाने की जरूरत है। अब इसे कैसे निर्मल बनाये रखा जा सकता है, इस पर विशेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किये।
हमें नदियों के प्रवाह एवं उपचार के लिए प्रणालीगत बदलाव लाने के लिए कार्य करना होगा, ऐसा बदलाव जो उन्हें समृद्ध बनाता है, उनकी समृद्ध, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं को संरक्षित करता है। इस पैनल में चर्चा का उद्देश्य उन तरीकों की जांच करना था जिससे हम अपने पर्यावरण के साथ और अधिक सामंजस्य में रह सकते हैं, नदियों, पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य का समर्थन करते हैं, और जैव विविधता को बनाये रखने हेतु मिलकर प्रयास करेंगे। इन कारवाइयों में सरकारी नियम और प्रवर्तन के साथ ही समाज के सभी स्तरों पर यथा बच्चों से लेकर बड़ों तक तथा नागरिकों से लेकर निगमों तक की जिम्मेदारी व दायित्वों पर विचार विमर्शं किया गया।
तालाबंदी के दौरान अभी गंगा में क्या विशिष्ट परिवर्तन हुए हैं? पानी की गुणवत्ता, पोस्ट-लॉकडाउन भी इसे बनाए रखने हेतु क्या किया जाये। इसके संबद्ध में संस्थानों द्वारा भविष्य में क्या किया जायेगा, इस पर व्याख्या की गयी।
डा रमेश पोखरियाल निशंक, माननीय केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री, ने कहा कि गंगा माँ सभी के लिये समान भाव रखती है। भारत की तो संस्कृति ही ऐसी है कि वह पूरे विश्व को एक परिवार मानती है, हम वसुधैव कुटुम्बकम् की संस्कृति को जीते है। हमने धरती को माता कहा है। भारत हमेशा से सभी का सहायक रहा है। माँ गंगा राष्ट्रीय धरोहर ही नहीं बल्कि विश्व धरोहर है। माँ गंगा के स्पर्श से ही शान्ति मिलती है। कहा जाता है कि माँ गंगा के जल में व्याधियों के निवारण की क्षमता है। माँ गंगा के लिये पूरे विश्व को संवेदनशील होना होगा। उन्होंने कहा कि हम सभी के प्रयासों से हम उत्तराखंड़ से माँ गंगा को गंगोत्री की तरह ही पवित्र और निर्मल रूप में आगे प्रवाहित करने में अपना योगदान अवश्य देंगे। उत्तराखंड पर्यावरण की पहली पाठशाला है। यहां पर लोग पौधों को बच्चों की तरह पालते है। इस राज्य ने देश को अनेक पर्यावरणविद् दिये है। हिमालय में तन और मन को ठीक करने की शक्ति है। हमें इन सब कामों के लिये बड़ा मन चाहिये; बड़ा समर्पण चाहिये।
श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, जलशक्ति मंत्री, भारत सरकार, ने सतत विकास की बात करते हुये कहा कि हमारे देश की 50 प्रतिशत आबादी गंगा बेसिन पर आधारित है। हमें जल भागीदारी को सुनिश्चिित करना होगा, प्रत्येक व्यक्ति को माँ गंगा से जुड़़ना होगा। माँ गंगा को आर्थिक विकास का आधार मानकर कार्य करना होगा। गंगा के साथ प्रत्येक व्यक्ति का प्रत्यक्ष जुड़ाव हो इस पर कार्य करना नितांत आवश्यक है। गंगा अपने आप में एक बहुत बड़ा ब्रांड है अतः गंगा जल से निर्मित प्रोडक्ट को और बढ़ाना होगा। गंगा के साथ जनभागीदारी का जुड़ाव बहुत जरूरी है। आने वाले समय में हम देश की सभी नदियों के लिये कार्य करेंगे लेकिन इसका मार्ग जन भागीदारी से होकर जाता है। प्रत्येक व्यक्ति का जल के साथ व्यवहार विवकपूर्ण हो।

परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि शिक्षा में पर्यावरण बहुत जरूरी है। पहले भी हमारी चर्चा माननीय निशंक जी के साथ हुई थी कि विद्यार्थियों को अब ’’ग्रेस माक्र्स के स्थान पर ग्रीन माक्र्स’’ दिये जाये। अब तो यह बहुत ही जरूरी हो गया है कि ’’पहाड़ के लोग वापस पहाड़ पर’’ क्योकि पहाड़ियों का दर्द भी पहाड़ जैसा; पहाड़ के लोगों का दर्द भी पहाड़ जैसा है और उसका समाधान भी एक ही है ’पलायन नहीं बल्कि घर वापसी’। कोरोना ने तो यह करके भी दिखा दिया कि चलो अपने गांवों और घरों की ओर, और उस पर माननीय मोदी जी ने आत्मनिर्भर भारत की मोहर भी लगा दी। गांव बदलेगा तो देश बदलेगा।
स्वामी जी ने कहा कि उत्तराखंड में तो ’पलायन निवारण की भी संजीवनी बूटी है ’पर्यटन’ वह भी ’ग्रीन पर्यटन-ग्रीन तीर्थाटन’। जड़ी-बूटियों से समृद्ध है अपना प्रदेश, अतः जो लोग वापस आये है उन्हें जैविक खेती, पहाड़ी संस्कृति, पहाड़ी मंडवा, रागी जैसे उत्पादों से युक्त पदार्थो का निर्माण, पहाड़ी दालें और अन्य पहाड़ी उत्पादों को बढ़ावा देना होगा, यहां का बुरांश, यहां का शर्बत, फल, फूल विश्व तक अपनी पहुंच बना सकते हैं। इस हेतु सरकार के साथ अन्य संस्थाओेेें का सहयोग भी बहुत जरूरी है तभी हम जो लोग कोरोना संकट के समय में अपने भाई-बहिन घर वापस आये हंै उनको मदद कर सकते हैं और भविष्य में होने वाले पलायन को भी रोक सकते हैं।
स्वामी जी ने कहा कि अब लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार देने की जरूरत है ताकि वे अपने परिवार वालों के साथ यही रहकर अपनी आजीविका चला सकंे। उन्होनंे कहा कि प्लास्टिक जैसे उत्पादों का उपयोग न करें, खुद भी स्वस्थ रहें और पहाड़ को भी स्वस्थ रखेंगे। हमारे राज्य के पास हिमालय रूपी अपार आॅक्सीजन का भण्डार है तथा स्वच्छ जल और शान्ति का स्रोत माँ गंगा है अतः यहां पर पूरे विश्व से पर्यटक मानसिक शान्ति के साथ आॅक्सीजन लेने हेतु आयेंगे, हमने इन्हें ही सम्भाल कर रखा तो बहुत है। ग्रीन संदेश ही इस राज्य का संदेश हो। हमें ग्रीन कल्चर का निर्माण करना होगा, हमारे हर कार्य की शुरूआत से हरित शुरूआत हो। स्वामी जी ने कहा कि हमारे हर स्तर के पाठ्यक्रम में ग्रीन कल्चर-ग्रीन शिक्षा का समावेश करना होगा।
इस वेबनार में विशेषज्ञों ने निम्न लिखित प्रश्नों के सारगर्भित उत्तर दिये
1. लॉकडाउन से बाहर निकलते ही हम अपने पर्यावरण के साथ अधिक सामंजस्य कैसे रख सकते हैं?
2. एक समाज के रूप में, हम अपनी नदियों के साथ किस तरीके का व्यवहार करे और पहले की आदतो को कैसे बदलें? उदाहरण के लिए भारत में जल को प्रभावी ढंग से साफ करने के लिए एवं उद्योग और सीवेज के अपशिष्ट जल के उपचार के संबंध में सरकारी नियमों के संदर्भ में क्या विशिष्ट परिवर्तन लागू किए जाने चाहिए? महत्वपूर्ण बात यह है कि इन मानकों को कैसे लागू किया जाएगा?
श्री यू पी सिंह जी, सचिव, जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार, ने वर्तमान में मंत्रालय क्या कर रहा है, और वे पोस्ट-लॉकडाउन क्या करने की योजना बना रहे हैं? इस पर अपने विचार व्यक्त किये, नमामि गंगे – छडब्ळ पहल किस पर और कैसे काम कर रही है? पोस्ट कोविद -19 के विस्तार के पश्चात आगे की क्या योजना है?
प्रो रमेश ऋषिकल्प, गेन्ट विश्वविद्यालय बेल्जियम ने राइन और गंगा नदी के बीच तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य, सबका मूल्यांकन और लॉकडाउन से क्या सीखा और क्या सबक लेने की आवश्यकता पर जोर दिया।
डा बी.डी. त्रिपाठी, एमएम गंगा नदी संस्थानः जीवन शिक्षा कार्यक्रम, बच्चों और युवाओं में सहानुभूति (गंगा मित्र) और गंगा नदी संस्थान के कार्यों के बारे में साझा किया। पोस्ट-लॉकडाउन स्थिति में उस स्केलिंग और व्यापक प्रसार को कैसे देखंे और किन उपायों पर विचार हो, पर चर्चा की।
डा रूचि बडोला ;ॅप्प्द्ध ने नदी के पारिस्थितिक तंत्र की जैव विविधता की भूमिका और मूल्य को समझने के लिए लोगों को प्रशिक्षित करने के डब्ल्यूआईआई के काम को समझाया तथा अधिक लोगों को यह समझने में मदद कैसे की जा सकती है कि एक स्वस्थ नदी को कैसे बनाए रखा जा सकता है।
डॉ विनोद तारे, ने जीआरबीएम योजना और वाटरशेड के परिप्रेक्ष्य में बताया – नदी को साफ रखने के लिए क्या समाधान हैं हमें इसकी सभी सहायक नदियों और आसपास के क्षेत्रों सहित पूरे नदी के जलग्रहण को कैसे देखना चाहिए।
गंगा दशहरा वेबिनार में निम्नलिखित विशेष अतिथियों ने भाग लिया
. श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत जी, जलशक्ति मंत्री, भारत सरकार,
1. डा रमेश पोखरियाल निशंक जी, माननीय केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री,
2. पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती, परमाध्यक्ष, परमार्थ निकेतन, संस्थापक, गंगा एक्शन परिवार,
3. डा साध्वी भगवती सरस्वती, अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव, ग्लोबल इंटरफेथ वाश एलायंस,
4. श्री यू पी सिंह, सचिव, जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार
5. प्रोफेसर मार्केंडय आहूजा, कुलपति, गुरुग्राम विश्वविद्यालय

6. प्रो के रत्नम, भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद,
7. डा विनोद तारे, संस्थापक प्रमुख, गंगा नदी बेसिन प्रबंधन और अध्ययन केंद्र, आईआईटी कानपुर,
8. डा रूचि बडोला, भारतीय वन्यजीव संस्थान ;ॅप्प्द्ध
9. प्रो प्रमोद दुबे, एनसीईआरटी
10. डा इंदिरा मोहन, कवयित्री और महासचिव, दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन
11. प्रोफेसर डॉ बीडी त्रिपाठी, अध्यक्ष, महामना मालवीय गंगा अनुसंधान केंद्र, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी,
12. प्रोफेसर रमेश ऋषिकल्प, गेन्ट यूनिवर्सिटी बेल्जियम,
13. आरुषि निशंक, राष्ट्रीय संयोजक, स्पर्श गंगा, पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता
14. डा रचना बिमल, सहायक प्रोफेसर, सत्यवती कॉलेज,
15. पारुल महाजन, सामाजिक कार्यकर्ता और अंतर्राष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ,
16. गंगा नंदिनी, निदेशक परियोजना कार्यान्वयन, संचार, ग्लोबल इंटरफेथ वाश एलायंस।

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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