चमोलीधर्म-कर्म

उत्तराखंड में भगवान बद्रीनाथ धाम के कपाट ब्रह्ममुहुर्त में खोले गए!

बद्रीनाथ में आज होने वाला विष्णु सहस्त्रनाम पाठ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के नाम!

Badrinath dham 15.5.2020... कपाटोद्घाटन!
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देवभूमि जे के न्यूज़!
कपाटोद्घाटन से पहले बद्रीनाथ मंदिर को फूलों से भव्य तरीके से सजाया गया। वैश्विक महामारी में लॉकडाउन के चलते इस मौके पर बद्रीनाथ में कोई भी यात्री मौजूद नहीं है।केवल गिनती के ही कुछ लोग मंदिर में देखे गए। पूरे विधि-विधान के साथ शुक्रवार 4.30 बजे मंदिर के कपाट खोले गए।

बद्रीनाथ में आज होने वाला विष्णु सहस्त्रनाम पाठ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के नाम की हुई! देश को कोरोना से मुक्ति की भगवान बद्रीनाथ से कामना की जाएगी। कपाट खुलने के समय मुख्य पुजारी रावल, धर्माधिकारी भूवन चन्द्र उनियाल, राजगुरु सहित केवल कुछ लोग ही शामिल हो सके। इस दौरान मास्क के साथसमाजिक दूरी का पालन किया गया। इससे पूर्व पूरे मंदिर परिसर को सैनिटाइजरींग किया गया। कपाट खुलने से पूर्व गर्भ गृह से माता लक्ष्मी को लक्ष्मी मंदिर में स्थापित किया गया, और कुबेर जी व उद्धव जी की चल विग्रह मूर्ति को गर्भ गृह में स्थापित किया गया।
आईये संक्षेप में भगवान बद्रीनाथ के विषय में जानें!
बद्रीनाथ या बद्रीनारायण मंदिर एक हिन्दू मंदिर है जो हिन्दुओं के भगवान विष्णु को समर्पित है। ये मंदिर भारत में उत्तराखंड में बद्रीनाथ शहर में स्थित है। बद्रीनाथ मंदिर और शहर चार धाम और छोटा चार धाम तीर्थ स्थलों में से एक है।
पवित्र धार्मिक स्थल
बद्रीनाथ मंदिर 108 दिव्य विष्णु भगवान को समर्पित उन बचे हुए मंदिरों में से एक पवित्र धार्मिक स्थल है जिनकी पूजा की जाती है और जो वैष्णवों के लिए बद्रीनाथ में से एक है। हिमालय क्षेत्र में खराब मौसम की स्थिति के कारण हर साल बद्रीनाथ मंदिर (अप्रैल के अंत और नवंबर की शुरुआत के बीच) छह महीने के लिए खुला रहता है।
अलकनंदा नदी के किनारे
मंदिर समुद्र के स्तर से ऊपर 3,133 मीटर ( 10,279 फीट) की ऊंचाई पर अलकनंदा नदी के किनारे चमोली पहाड़ी जिले में गढ़वाल पहाडि़यों में स्थित है. यह भारत के सबसे अधिक दौरा किया जाने वाले तीर्थ केंद्रों में से एक है और हर साल यहाँ लगभग 106,0000 दर्शक आते है.
बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास
बद्रीनाथ मंदिर शहर में मुख्य आकर्षण है. पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने बद्रीनारायण की छवि एक काले पत्थर पर शालिग्राम के पत्थर के ऊपर अलकनंदा नदी में खोज की। वह मूल रूप से तप्त कुंड हॉट स्प्रिंग्स के पास एक गुफा में बना हुआ था.
मंदिर की स्‍थापना
सोलहवीं सदी में गढ़वाल के राजा ने मूर्ति को उठवाकर वर्तमान बद्रीनाथ मंदिर में ले जाकर उसकी स्‍थापना करवा दी. बद्रीनाथ मंदिर 17 वीं सदी में अवलांचे द्वारा कई प्रमुख इमारतों को नुकसान हुआ और जिससे मंदिर में मरम्मत का समय आया।
गढ़वाल के राजा
बद्रीनाथ मंदिर का गढ़वाल के राजाओं द्वारा विस्तार किया गया था. 1803 में हिमालय भूकंप में महत्वपूर्ण नुकसान के बाद यह जयपुर के राजा द्वारा बनाया गया था.मंदिर लगभग 50 फीट (15 मीटर) लंबा है और इसके शीर्ष पर एक छोटा सा गुंबद है. इसका मुखौटा धनुषाकार खिड़कियों के साथ पत्थर से बनाया गया है।
मंदिर की वास्तुकला
एक व्यापक सीढ़ीनुमा एक लंबा धनुषाकार प्रवेश द्वार है जो मुख्य प्रवेश द्वार है. वास्तुकला में इस मंदिर का निर्माण बौद्ध मंदिरों के जैसा हुआ था और ये एक बौद्ध विहार (मंदिर) जैसा दिखता है. मंदिर के मंडप के अंदर, एक बड़े स्तंभों वाला हॉल है जो गर्भगृह या मुख्य मंदिर क्षेत्र की ओर ले जाता है।
बद्रीनाथ के बारे में दंतकथा
तीर्थ के नाम पर स्थानीय शब्द बद्री एक बैर से निकलता है जो की एक जंगली बेर का एक प्रकार है. यह कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु इन पहाड़ों में तपस्या में बैठे थे तब उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी ने एक बेर के पेड़ का रूप ले लिया था और तेज सूरज की किरणों से उसे छायांकित किया।
तीर्थयात्रियों, संतों और ऋषियों का घर
ये मंदिर न केवल खुद भगवान बद्री का निवास स्थान है बल्कि ये मंदिर अनगिनत तीर्थयात्रियों, संतों और ऋषियों का घर है जो ज्ञान की तलाश में यहां ध्यान करने के लिए आ जाते है।
मंदिर के बारे में एक कथा के अनुसार इस जगह पर एक बार भगवान शिव और देवी पार्वती का निवास हुआ करता था. विष्णु भगवान् एक छोटे लड़के के रूप में भेष बनाकर आये और जोर-जोर से रोने लगे. उन्हें परेशान और रोता हुआ देखकर पार्वती ने उनके रोने का कारण पूछा और उन्होंने कहा है कि वह ध्यान करने के लिए बद्रीनाथ चाहता था।
शिव और पार्वती ये समझ गए की बच्चे के भेष में ये कोई और नहीं बल्कि भगवान नारायण थे। इस तरह शिव् और पार्वती वो जगह छोडकर चले गए और विष्णु का वास वहां हो गया।

जय कुमार तिवारी

*हमेशा सच का साथ देना! ईमानदारी से आगे बढ़ना, दीनहीनों की आवाज को आगे पहुंचाना। सादा जीवन उच्च विचार और प्रकृति के बनाए हुए दायरे में जीवन निर्वहन करना। झूठ बोलने वालों और फरेब से दूर रहना, कभी किसी के अहित की बात नहीं सोचना। ईश्वर मेरे साथ हमेशा खड़े हैं!*

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